सोमवार, 23 मई 2011

दोहरा हत्याकाण्ड: मामले को लगातार उलझाया पुलिस
बहुचर्चित अनसुलझी पहेली दोहरे हत्याकाण्ड मामले की जांच पटेल साहब को दिये जाने के बाद एक उम्मीद की किरण दिखने लगी है और अब शायद दोहरे हत्याकाण्ड में शामिल अपराधी पुलिस गिरफ्त में आ जाएंगे। जांच धिरे-धिरे आगे बढ़ रही है और अब इस मामले में मृतकों के परिजनों व लोगों के बयानों के आधार पर डीएनए टेस्ट मिलान के आधार पर अब पुलिस अपराधियों तक पहुंचने का प्रयास करेगी। जिस तरह के बयान व जिस तरह से पिछले दो दिनों में केस की डायरी आगे बढ़ी है व जांच हो रही है, उसने अब यह तो साफ कर ही दिया है कि भले ही देर सही लेकिन अब अपराधियों पर शिकंजा जरूर चढ़ेगा। जिस तरह से विगत कई वर्षों से इस मामले को पुलिसीया जांच में दबाया गया या फिर राजनीतिक दबाव में इसे लटकाया गया, इसने यह तो साफ कर ही दिया है कि कहीं न कहीं इस मामले में कोई ना कोई ऐसा रसुक वाला जरूर है, जिसकी पकड़ मंत्री से लेकर संतरी तक और फिर सड़क से लेकर सरकार तक है तभी तो पिछले पांच वर्षों में यह देखने को मिला की जनता के लगातार जांच की मांग व राज्य सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, पूर्व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष शिवप्रताप सिंह व पूर्व के कई विधायकों व मंत्रियों के अनुशंसा व गृह मंत्रालय को पत्र प्रेषित करने के बावजूद गृहमंत्रालय द्वारा इस मामले में किसी भी प्रकार की कोई भी जांच न करा फाईल को यंू ही दबाकर रखने से जनता को महसुस कराया गया कि इस मामले की फाईल अब यूं ही दबी रहेगी। लगातार इस मामले में किसी भी प्रकार की कोई जांच नहीं होने के बाद लोगों ने तो अब यह कहना शुरू कर दिया था कि अब इसकी जांच कांग्रेस के शासनकाल में ही होगा। लेकिन एक बार फिर से समय ने करवट ली और एक बार फिर इसकी जांच शुरू होने से व इस मामले में तेज तर्रार पुलिस अधिकारी को जांचकर्तां बनाने के बाद अब ऐसा महसुस किया जाने लगा है कि इस मामले का पटाक्षेप शायद जल्द ही हो।
कई अड़चने है इस मामले में - जैसा की पहले भी कहा जा चुका है कि इस मामले में पुलिस के पूर्ववर्ती अधिकारियों व कर्मचारियों ने जरूरत से ज्यादा लिपा पोती करते हुए, इस मामले में बादी गिरोह का शामिल होना बताया गया, लेकिन वहीं दूसरी तरफ जब डीएनए रिर्पोट ने पुलिस की बनावटी कहानी को झुठा साबित करते हुए, बादी गिरोह को बाईज्जत व इस मामले में अपराधी करार नहीं दिया गया। तब पुलिस की चारों ओर थू-थू हुई। लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने इस मामले की जांच आगे न बढ़ाते हुए इस मामले की फाईल को दबा दिया गया। जिसने कहीं न कहीं इस बात को भी बल दिया है कि इस मामले की जांच नहीं करने को और कई पूर्ववर्ती पुलिस के अधिकारियों ने स्वीकारा भी है कि पुलिस पर राजनीतिक दबाव बनाया गया और मामले को यूं ही दबा दिया गया। ऐसे में क्या वर्तमान में जांच कर रहे पुलिस के अधिकारियों पर दबाव नहीं बनाया जा सकता, क्या इन्हें परेशान नहीं किया जाएगा। जैसे कई सवाल ऐसे हैं जो कि अभी भी इस जांच में प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं।
सबूतों को अभाव - दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इस मामले के घटना स्थल को पुलिस ने पूर्व में ही नष्ट कर दिया था, अर्थात् कहें तो घटनास्थल के शुरूवात के दिनों से ही पुलिस ने इस मामले में लापरवाही करते हुए समुचे घर व चारों ओर काफी लोगों को प्रवेश की इजाजत दी, जिससे की कई सबूत नष्ट होने के आसार हैं साथ ही कुछ जो फिंगर प्रिंट के आधार पर या अन्य आधार पर डीएनए रिर्पोट तैयार किए गए वहीं एक ऐसा सबूत है जो कि अपराधियों तक पुलिस को पहुंचा सकता है। बाकी अब ऐसा कोई सबूत नहीं है जो कि पुलिस को अपराधियों तक पहुंचाने हेतु शेष बचे हैं।
घटना स्थल को कर दिया गया नष्ट - घटना स्थल धिरे-धिरे तब से ही जिर्ण-शिर्ण होना शुरू हो गई थी जब की पुलिस यहां पर अपना पण्डाल लगा कर यूं ही जांच की बात पर बैठी हुई थी, धिरे-धिरे पुलिस ने मामले को लेकर जांच करना बंद कर दिया और अपने कैम्प को भी बंद कर दिया फिर अचानक कुछ दिनों के बाद यहां के मकान भी ढहा दिए गए और वहां पर अब एक कॉम्लेक्स रूपी मकान का निर्माण कर दिया गया है, चूंकि पुराने मकानों के आधार पर नए जांच अधिकारीयों को कई जांच के बिन्दू मिल सकते थे, जैसे की हत्यारों के प्रवेश का स्थान या फिर कई बिन्दूओं पर अधिकारी जांच कर सकते थे, लेकिन मकान के गिरा कर काम्पलेक्स के निर्माण से ऐसा लगने लगा है जैसे कि अपराधियों को पूर्व में ही इस बात के संकेत मिल चुके थे कि इस मामले की फाईल जल्द ही खुलने वाले हैं और शायद यही कारण है कि यहां पर जल्द से जल्द आनन-फानन में काम्पलेक्स का निर्माण करवा दिया गया होगा।
एक मात्र प्रत्यक्षदर्शी - इस बहुचर्चित अनसुलझे दोहरे हत्याकाण्ड की पहेली में एक बच्ची ही ऐसी थी, जिसने पुलिस वालों को एक अंकल के बारे में बताया था, चंूकि इस घटना को पांच वर्ष बित चुके हैं और अब शायद ही बालिका के मस्तिष्क में वे सारे दृष्य मौजूद हो या फिर व शायद ही अब उस तारतम्यता से जैसे उसने उस समय बयान दिया था, अब बयान दे सके।
क्या पुलिस पर भी हो सकती है कार्यवाही - दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि क्या इस मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद सच सामने आने पर व अपराधियों के पकड़े जाने के बाद, पूर्ववर्ती व घटना के समय के पुलिसकर्मियों व अधिकारियों पर क्या कार्यवाही होगी या फिर ईनाम दिए जाएंगे यह भी एक बहुत बड़ी व सोचने योग्य सवाल है कि आखिरकार क्यों और कैसे पुलिस उन अपराधियों तक नहीं पहुंच सकी।
पुलिस ने झूठी कहानी क्यों बनाई - इस मामले में पुलिस ने जब देखा की लगातार जनता का दबाव पुलिस पर बढ़ रहा है तो पुलिस ने झुठी कहानी बनाकर बादी गिरोह को गिरफ्तार किया और कई जेवर भी बरामद किए, जिसे मृतिका के परिजनों ने साफ तौर पर यह कह कर मना कर दिया था कि ये जेवर मृतिका मेें से किसी के नहीं है, सभी के जेवर घर में सलामत हैं, ऐसे सवाल ये उठता है कि पुलिस ने झुठी कहानी क्यों बनाई ?
क्या डीएनए टेस्ट का मिलान होगा - अब जांच को फिर से शुरू किया गया है, तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या अब सही आरोपियों तक पहुंच कर पुलिस क्या डीएनए का मिलान करेगी या फिर अबकी बार पुलिस के हाथ से डीएनए रिपोर्ट ही खो जाएगा।
दोहरा हत्याकाण्ड: मामले को लगातार उलझाया पुलिस नेअम्बिकापुर/बहुचर्चित अनसुलझी पहेली दोहरे हत्याकाण्ड मामले की जांच पटेल साहब को दिये जाने के बाद एक उम्मीद की किरण दिखने लगी है और अब शायद दोहरे हत्याकाण्ड में शामिल अपराधी पुलिस गिरफ्त में आ जाएंगे। जांच धिरे-धिरे आगे बढ़ रही है और अब इस मामले में मृतकों के परिजनों व लोगों के बयानों के आधार पर डीएनए टेस्ट मिलान के आधार पर अब पुलिस अपराधियों तक पहुंचने का प्रयास करेगी। जिस तरह के बयान व जिस तरह से पिछले दो दिनों में केस की डायरी आगे बढ़ी है व जांच हो रही है, उसने अब यह तो साफ कर ही दिया है कि भले ही देर सही लेकिन अब अपराधियों पर शिकंजा जरूर चढ़ेगा। जिस तरह से विगत कई वर्षों से इस मामले को पुलिसीया जांच में दबाया गया या फिर राजनीतिक दबाव में इसे लटकाया गया, इसने यह तो साफ कर ही दिया है कि कहीं न कहीं इस मामले में कोई ना कोई ऐसा रसुक वाला जरूर है, जिसकी पकड़ मंत्री से लेकर संतरी तक और फिर सड़क से लेकर सरकार तक है तभी तो पिछले पांच वर्षों में यह देखने को मिला की जनता के लगातार जांच की मांग व राज्य सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, पूर्व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष शिवप्रताप सिंह व पूर्व के कई विधायकों व मंत्रियों के अनुशंसा व गृह मंत्रालय को पत्र प्रेषित करने के बावजूद गृहमंत्रालय द्वारा इस मामले में किसी भी प्रकार की कोई भी जांच न करा फाईल को यंू ही दबाकर रखने से जनता को महसुस कराया गया कि इस मामले की फाईल अब यूं ही दबी रहेगी। लगातार इस मामले में किसी भी प्रकार की कोई जांच नहीं होने के बाद लोगों ने तो अब यह कहना शुरू कर दिया था कि अब इसकी जांच कांग्रेस के शासनकाल में ही होगा। लेकिन एक बार फिर से समय ने करवट ली और एक बार फिर इसकी जांच शुरू होने से व इस मामले में तेज तर्रार पुलिस अधिकारी को जांचकर्तां बनाने के बाद अब ऐसा महसुस किया जाने लगा है कि इस मामले का पटाक्षेप शायद जल्द ही हो।
कई अड़चने है इस मामले में - जैसा की पहले भी कहा जा चुका है कि इस मामले में पुलिस के पूर्ववर्ती अधिकारियों व कर्मचारियों ने जरूरत से ज्यादा लिपा पोती करते हुए, इस मामले में बादी गिरोह का शामिल होना बताया गया, लेकिन वहीं दूसरी तरफ जब डीएनए रिर्पोट ने पुलिस की बनावटी कहानी को झुठा साबित करते हुए, बादी गिरोह को बाईज्जत व इस मामले में अपराधी करार नहीं दिया गया। तब पुलिस की चारों ओर थू-थू हुई। लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने इस मामले की जांच आगे न बढ़ाते हुए इस मामले की फाईल को दबा दिया गया। जिसने कहीं न कहीं इस बात को भी बल दिया है कि इस मामले की जांच नहीं करने को और कई पूर्ववर्ती पुलिस के अधिकारियों ने स्वीकारा भी है कि पुलिस पर राजनीतिक दबाव बनाया गया और मामले को यूं ही दबा दिया गया। ऐसे में क्या वर्तमान में जांच कर रहे पुलिस के अधिकारियों पर दबाव नहीं बनाया जा सकता, क्या इन्हें परेशान नहीं किया जाएगा। जैसे कई सवाल ऐसे हैं जो कि अभी भी इस जांच में प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं।
सबूतों को अभाव - दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इस मामले के घटना स्थल को पुलिस ने पूर्व में ही नष्ट कर दिया था, अर्थात् कहें तो घटनास्थल के शुरूवात के दिनों से ही पुलिस ने इस मामले में लापरवाही करते हुए समुचे घर व चारों ओर काफी लोगों को प्रवेश की इजाजत दी, जिससे की कई सबूत नष्ट होने के आसार हैं साथ ही कुछ जो फिंगर प्रिंट के आधार पर या अन्य आधार पर डीएनए रिर्पोट तैयार किए गए वहीं एक ऐसा सबूत है जो कि अपराधियों तक पुलिस को पहुंचा सकता है। बाकी अब ऐसा कोई सबूत नहीं है जो कि पुलिस को अपराधियों तक पहुंचाने हेतु शेष बचे हैं।
घटना स्थल को कर दिया गया नष्ट - घटना स्थल धिरे-धिरे तब से ही जिर्ण-शिर्ण होना शुरू हो गई थी जब की पुलिस यहां पर अपना पण्डाल लगा कर यूं ही जांच की बात पर बैठी हुई थी, धिरे-धिरे पुलिस ने मामले को लेकर जांच करना बंद कर दिया और अपने कैम्प को भी बंद कर दिया फिर अचानक कुछ दिनों के बाद यहां के मकान भी ढहा दिए गए और वहां पर अब एक कॉम्लेक्स रूपी मकान का निर्माण कर दिया गया है, चूंकि पुराने मकानों के आधार पर नए जांच अधिकारीयों को कई जांच के बिन्दू मिल सकते थे, जैसे की हत्यारों के प्रवेश का स्थान या फिर कई बिन्दूओं पर अधिकारी जांच कर सकते थे, लेकिन मकान के गिरा कर काम्पलेक्स के निर्माण से ऐसा लगने लगा है जैसे कि अपराधियों को पूर्व में ही इस बात के संकेत मिल चुके थे कि इस मामले की फाईल जल्द ही खुलने वाले हैं और शायद यही कारण है कि यहां पर जल्द से जल्द आनन-फानन में काम्पलेक्स का निर्माण करवा दिया गया होगा।
एक मात्र प्रत्यक्षदर्शी - इस बहुचर्चित अनसुलझे दोहरे हत्याकाण्ड की पहेली में एक बच्ची ही ऐसी थी, जिसने पुलिस वालों को एक अंकल के बारे में बताया था, चंूकि इस घटना को पांच वर्ष बित चुके हैं और अब शायद ही बालिका के मस्तिष्क में वे सारे दृष्य मौजूद हो या फिर व शायद ही अब उस तारतम्यता से जैसे उसने उस समय बयान दिया था, अब बयान दे सके।
क्या पुलिस पर भी हो सकती है कार्यवाही - दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि क्या इस मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद सच सामने आने पर व अपराधियों के पकड़े जाने के बाद, पूर्ववर्ती व घटना के समय के पुलिसकर्मियों व अधिकारियों पर क्या कार्यवाही होगी या फिर ईनाम दिए जाएंगे यह भी एक बहुत बड़ी व सोचने योग्य सवाल है कि आखिरकार क्यों और कैसे पुलिस उन अपराधियों तक नहीं पहुंच सकी।
पुलिस ने झूठी कहानी क्यों बनाई - इस मामले में पुलिस ने जब देखा की लगातार जनता का दबाव पुलिस पर बढ़ रहा है तो पुलिस ने झुठी कहानी बनाकर बादी गिरोह को गिरफ्तार किया और कई जेवर भी बरामद किए, जिसे मृतिका के परिजनों ने साफ तौर पर यह कह कर मना कर दिया था कि ये जेवर मृतिका मेें से किसी के नहीं है, सभी के जेवर घर में सलामत हैं, ऐसे सवाल ये उठता है कि पुलिस ने झुठी कहानी क्यों बनाई ?
क्या डीएनए टेस्ट का मिलान होगा - अब जांच को फिर से शुरू किया गया है, तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या अब सही आरोपियों तक पहुंच कर पुलिस क्या डीएनए का मिलान करेगी या फिर अबकी बार पुलिस के हाथ से डीएनए रिपोर्ट ही खो जाएगा।